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Showing posts from December, 2020

होगा कभी ऐसा शायद . .

होगा कभी ऐसा शायद । किसी पुराने फोल्डर में तस्वीर तुम्हारी नयी सी मिल जाएगी  तुम कह रही होगी थोड़ा सा झिझकते सी भूल गए कि याद है? वो झील किनारे वाली बातें मुलाकातें जब आंखो में आंखे डालें  एक दूजे के सहारे  हम मिले थे दो किनारे भूल गए कि याद है? खिली सी शाम में मधम सी रोशनी क्या नहीं कहा तुम्हारी आंखों ने वो गुदगुदाते रुलाते मंजर तमाम  भूल गए कि याद है?

I will never compel you......

It wasn't like this  my eyes were full my throat was sore  I wanted to breath but not any more, How can I see sorrow sadness and inefficacy I was there to love  contentment and joy  Things were unsaid,  desire was blown  I never intended to compel you I love you like depth of core,   I am concealing my fervor to see, talk and coffee with you   I wanted to be around you  but not able to  Its same when you take responsibility and I never compel you I love you so will walk  Its up to you  I will be there  whenever you wanna talk, How much is respect  there is no scales  Some things are mutual  some ego bigger words are bitter  emotions are hidden Who have won the debates Who took rewards I don't wanna be winner because love only matter I will never compel you...

उम्र भर प्रेम करने को.................

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प्रेम की जात थोड़े ना होती है  प्रेम तो होता है बस  किन्ही ख़ूबसूरत सी आँखों से  जिनमें भरी  रहती है  ढेर सारी चाहत, प्रेम तुमसे नाम नहीं पूछता  वो रख देता है  बहुत सारे नाम  अनूठे, अजीब रस भरे  देते रहते हैं जो  सुकून और ह्रदय को राहत, प्रेम में कोई अलग नहीं होता  वो रहते हैं साथ  यादों, वादों, इरादों में  कभी दुपहरी की धुप सा जलते हुए  तो कभी समंदर सा मचलते   कहीं गहरे जिन्दा रहता है    प्रेम और  मिलती रहती है चाहत, प्रेम मांगता नहीं   वो अनवरत समर्पित करता है  खुशियां, हँसी, जीवन, प्यार  और दे देता है अपनी उम्र  साथी के दुःख कम करने को  छोड़ देता है मोहब्बत  फिर  उम्र भर प्रेम करने को।   

तुम नद भर जाना..................

हे नदी !! तुम्हारे साहिल पर खड़ा वो पेड़ जिसे अच्छा लगता है  तुम्हारा रस भरा गान  स्वच्छंद बहते पानी का  तना सहलाते जाना    जड़ों में भर देना ऊर्जा अपार,  वो सुनता है अनकहे किस्से  तुम्हारी सुरमयी आँखों के   ऊंघते लोगों के मुँह से  जिन्होंने किनारों पर बैठकर  तुम्हे चाहा है बेशुमार, उसके हरित पर्ण पर अंकित  डूबते सूरज से रोशन मुक्त तरंगो के सब भाव  जिसने लिखी तुम्हारी तरुणाई पर निष्ठुर कवितायें हज़ार,  परिंदो के आशियाने हर्षित करती प्रेम क्रीड़ाएं  निर्बाध निस्वार्थ सींचा  लहलहाता रहा वो पेड़  न थी जिसे विपत्ति की आशंकाए  करता रहा वो नदी से प्यार, अबके ऋतु ऐसा आया  पथिक व्यथा में, हवा सुखी  अकाल पड़ा देश देशांतर  ये किस्सा नूतन है, अनूठा कहते  नदी सहमी संकरी पेड़ से दूर बहती  पत्ते उड़ चले  और  बस ठूंठ सा   झुका है सरिता की बाहों में  आने को आतुर,    फिर बदले जो मौसम  तुम नद भर जाना  समेट...