Posts

Showing posts from October, 2016

अरण्य सी पागल इच्छाएं..............

कि तुझे चाहते हैं  या नहीं मापदंड निर्णय तुम्हारे हैं अरण्य सी पागल इच्छाएं है कितनी, कि देखकर तुम्हारी उदास आँखे धड़कने धीरे हो जाती हैं दिल बैठ जाता है, कि समझते तुम्हारी हंसी को और तुम्हारे दर्द को महसूस करते है कि नदी जैसे सहलाती हुयी चलती है धरा के ह्रदय को अनवरत शीतल सी मुझे तुम, कि वन के शोर को भांप लेते हैं  वन वाशिंदे मैं तेरे ह्रदय के शोर को, कि कहनी हैं तुझसे ना कहने वाली कुछ बातें और सुननी भी हैं बहुत सारी, कि चल अपने चाहतों के बादलों की गठरी बाँध के बरस जाएँ किसी जगह बुझा दें प्यास !  

सता दूं क्या ?

Image
कैसे ढलती हैं शामें तुम्हे बता दूं क्या, किस्सागो तो नहीं हूँ सच जता दूं क्या ? अश्क़ छलकने का सामान है गठरी भर इजाज़त है कि कर ऐसे खता दूं क्या ? वर्षो से देवता तुम मेरे मन के जालिम पूछते हो मुझसे तुम्हारा पता दूं क्या ? हर बात तुम्हारी मानी आँखे मूंदकर मेरी मर्ज़ी की फ़िक्र है तो मता दूं क्या ? बुरा न मानो तो छोड़ कर चले जाएँ बहुत सताया थोड़ा मैं भी सता दूं क्या ? इंतज़ार का हिसाब ना जानो तो ठीक रोओगे बेहिसाबी, रुकूँ या बता दूं क्या ?