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Showing posts from August, 2011

अन्ना गाँधी नहीं हैं..पर जनता की मजबूरी है....

एक मैं ही नहीं सभी के दिल  में ये विचार है  और सवाल भी की जनता अन्ना के पीछे क्यों? हर गली हर नुक्कड़  पर अन्ना है और दिन ब  दिन बढ़ते जा रहे हैं, तो क्या केवल अन्ना का उपवास इसका एकमात्र कारण है  या कही दुसरे ढेर सारे कारण एकत्र हो कर जनता को एक तरफ  कर रहे है / ये तो आजकल केंद्र में बैठी हुई सरकार के बहुत सारे मंथन/ चिंतन कर्ता सोच रहे होंगे, लगातार दिन रात, इस मुशीबत से निजात पाने की कोशिश भी  कर रहे होंगे, तो उन्हें क्या मिला? जवाब खुद जनता ही है/ देखिये अन्ना गाँधी नहीं हैं न थे न होंगे,  हां कुछ अपनाये जाने वाले रास्ते गाँधी  वादी हो सकते हैं/ यहाँ सवाल ये उठता है की केवल गाँधी वादी होने से जनता समर्थन करती है या कारण को समर्थन मिलता है/ यहाँ पर समर्थन कारण को मिल रहा...

कशमकश, को मेरी यूँ आसान कर दिया

मिले  आज इतने अरसे बाद जो  जाने क्यों अपने से लगे वो, यु तो था जहाँ में कोई है पर पता न था होगा अपना वो/ प्यार  की  कुर्बानियों  से डरने  लगे  इशक की   नादानियो  से डरने लगे,    यु तो गुफ्तगू  बराबर  उनसे,  पर होगा क्या     दिल  की शैतानियों  से डरने लगे/ अब क्या कहे और क्या न कहे काबिले तारीफ है हिम्मत उनकी कशमकश, को मेरी यूँ आसान कर दिया तपाक से जो वो गले मिलने लगे /

जो था दिल्लगी के लिए

आज सोचा है बहुत साल बाद की जो था दिल्लगी  के लिए, उससे तो लाख अच्छा था जो मिला जिंदगी के लिए/ ये चाँद, ये रात, दो रूहे-एक बदन तू जमाना तू रब, सब नकली बाते, तेरे इश्क में निकले हैं अश्क इतने की संभाले नहीं जाते, क्या थोड़ी सी खैरात न थी तेरे पास मेरी बंदगी के लिए/ मैंने यु ही टटोला तेरे मन को परते उतारकर, राज़ को राज़ रहने देते तो क्या बात थी, गए छोड़कर तुम जिस दिन मुझे, वो दिन न था सदी की सबसे स्याह रात थी/ फ़िक्र न कर हमें तो कुछ न कुछ बहाना चाहिए संजीदगी के लिए, वरना न्योछावर कायनात तेरी सादगी के लिए / आज सोचा है बहुत साल बाद की जो था दिल्लगी  के लिए, उससे तो लाख अच्छा था जो मिला जिंदगी के लिए/

ले गया सब साथ अपने वो

लड़े  थे  प्यार की  खातिर  जिससे  हम, था  सबसे  हंसी  दोस्त  जो / मैं  सोचता  हु अक्सर   की वो चला  गया , हर पल नज़र आता   दिल  में  बैठा  है  वो /   गर  मैं इतना  गरीब  न  होता  तो  शायद  तू  मेरा  नसीब  होता/  ये  दुनिया  है जालिम  बहुत  पर  गया  जो सो  तो गया वो /   उस  शहर   में ढूँढा  तुम्हे  और  गाँव  भी  छान  मारे  बहुत कुछ लम्हे थे हमें  प्यारे बहुत  ले गया सब साथ अपने वो/

इसे भी लीगल ही कर दो !

               हालाँकि मैं ये नहीं कहता की मैं कभी भ्रस्टाचार में सहभागी नहीं रहा हू बहुत बार ऐसा हुआ की इसमे मैं एक्टिव पर्तिभागी रहा परंतू एक टीस दिल में हमेशा रही है की काश कुछ ऐसा हो जाये की दिनचर्या में समाया हुआ ये भ्रस्टाचार कुछ कम या की बिलकुल ख़तम हो जाये/ अफ़सोस ये रहा की मेरी ये सोच करोड़ो भारतीयों की सोच की तरह केवल सोच ही रह गयी और हकीक़त कुछ और/ अब भ्रस्टाचार पर इतने हो हल्ले के बाद कभी-कभी ये लगने लगा है की क्यों न इसे लीगल  कर दिया जाये, आजकल जैसे prostituion को लीगल करने का चर्चा है क्यों न भ्रस्टाचार के बारे में भी ये सोचा जाये/                             देखिये ये मैं यकीं के साथ कह सकता हू की जन साधारण, जनता, नेता, कर्मचारी आदि सभी ...