Rajesh Poonia
..Poems, Stories, Other writings and well..Emotions/feelings ...सब जो अमर रहेंगी !!
Wednesday, September 9, 2026
Tuesday, August 11, 2026
मैं तेरी जान हुआ कब था..............
इश्क़ आसान हुआ कब था
मैं तेरी जान हुआ कब था,
यूँ मिलके अजनबी हैं दोनों
हमारा एक मकान हुआ कब था ?
मिलने पर बेहद नेक लगा
ऐसा की, ऐसा इंसान हुआ कब था,
उसके हृदय में घर था मेरा
फिर वहां मेहमान हुआ कब था ?
गर मैं नहीं तुम तो सुलझे थे
बिछड़ के समाधान हुआ कब था ?
तू समझ में आया धीरे धीरे
छोड़ा तो हैरान हुआ कब था?
मैं सकते में था उसे देखकर
पीठ का वो निशान हुआ कब था ?
फिर जैसे तोडा दिल उसने
इतना हैवान हुआ कब था ?
दीवारें खींचती चली गयी दरम्यान
जंग का एलान हुआ कब था ?
Friday, July 31, 2026
मेमोरी डिवाइस के कोने की तस्वीरें
हम ढूंढते रहे हैं
बहुत सी अनदेखी जगह
विचरते रहें हैं
संसार में मकसद बे मकसद,
कितने स्थान, लोग, पहाड़
झरने, पानी, समंदर
सूरज और चाँद
जो तस्वीरों में कैद हैं
पड़े रहते हैं ऐसे ही किसी
मेमोरी डिवाइस के कोने में,
जैसे गुजरे वक़्त में हमने
बसाये थे हज़ारों लम्हे
लाखों यादें
हमारे ह्रदय में,
खोजने पर ही मिलते हैं
अब वो चित्र जो बंद हैं
किसी डिवाइस में या मन में
परत दर परत नीचे दबे हुए,
वो भी तब जब सही अलगो लगा हो
सर्च में और दिमाग में
नहीं तो एक जैसी
अनगिनत छवि हैं
जो असली खोज को
इतनी देर तक बाधित
कर देती हैं
कि उम्र गुजर रही होती है
और हम तकनिकी पिछड़ेपन
के घेरे में फंस जाते,
बदन पर इतने मौसमों की मार
झेलते झेलते
परतें पाट नहीं पाते,
वो तस्वीरें और यादें
गडमगढ़ सी, नहीं मिलती फिर
जैसे भूले पासवर्ड के बाद
जब हार्ड रिसेट करो तो
सारे अवरोध ख़तम तो हो जाते
बस बहुत सारे हिस्से भी मिट जाते हैं
दिलो दिमाग के साथ भी
ऐसा ही होता
जो जैसा था
वैसा फिर नज़र नहीं आता रे निष्ठुर।
Tuesday, July 28, 2026
नासमझ
काश हर कोई
इस हद्द तक
नासमझ हो
कि वो यही विचारे
मैसेज का जवाब इसलिए नहीं
आया क्यूंकि
जिस से वो प्रेम करता है वो
फिलवक्त बहुत व्यस्त है,
उसने कॉल नहीं उठाया
क्यूंकि उसके आमने सामने
बहुत सारे लोग
टकटकी लगाए उसे देख रहे होंगे,
वो शहर में आकर
सुचना नहीं भेजता
क्यूंकि उसका
शेडूल बहुत टाइट होगा,
वो घर के पास से
बिना मिले चला गया
क्यूंकि रुकता अगर
तो बहुत देर हो जाती
गंतव्य तक पहुँचने में,
वर्षों तक
इस तरह कोई
नासमझ बना रहे
तो बस खालिस प्रेम
उस से ये सब करवाता
होगा रे निष्ठुर !!
Monday, June 29, 2026
उसे जाना नहीं रुकना है...........
वापसी की टिकट
नहीं करवायी थी उसने,
जब तुमने पूछा
जाने का क्या करोगे
उसने धीरे से कहा
अभी सोचा नहीं है,
उसे जाना नहीं
रुकना है।
तुमने भी
रोकना ही चाहा था
वो आँखे, कांपते होंठ, घेरती बाहें
सब यही कह रहे थे,
पर मन को मजबूत कर
ह्रदय को समझा कर
उसने कहा मैं देखूं
कौनसी बस में टिकट मिलेगी,
इस बात से जुदा
उसे जाना नहीं
रुकना है।
अपरिहार्य
है जीवन चक्र में मिलना
जिसे रचा है
प्रकृति ने,
और वो चाह रहें
दो किनारों की तरह
पूरक बन बहते हुए
ना मिलें,
बस राह दिखाते रहें
पानी को समंदर से मिलाने की
अलबत्ता
उसे जाना नहीं
रुकना है।
जैसे वर्षों से
किसी पहाड़ पर
जमी हुयी बर्फ
वहीँ रह जाना चाहती है
उसे नहीं बहना
तरल होकर समंदर तक
ऐसे ही
जीवन के ठहराव का आलिंगन बन
उसे जाना नहीं
रुकना है।
Friday, May 22, 2026
मशहूर है फकीरों में............
जितना लिखा नहीं होता लोगो की लकीरों में
कुछ लोग बाँट देते हैं उतना फकीरों में।
उसके घर से कोई खाली नहीं जाता
हालांकि शामिल नहीं है वो पैगम्बर पीरों में।
सब तो बेईमान नहीं निकलेंगे
कुछ लोग तो होंगे शरीफ भी अमीरों में।
ताजमहल की नीवं खुदवाओ तुम
देखना हो जो मजदूर कितने दबे जागीरों में।
जमीनें बेचकर ख़रीदे घर पक्के जिन्होंने
उनकी धुप बारिशें खो गयी तअमीरों में। (इमारतें )
खुद खामोश रहता है वो चित्रकार
पर बहुत सच बोलता है तस्वीरों में।
ये सियासतों के खेल बंद भी करो
बहुत लाल दे दिये मांओं ने कश्मीरों में।
उड़ना हमने बेटियों को सिखाया ही नहीं
शर्म, इज्जत, पगड़ी बाँध रखा कितनी जंजीरों में।
छोडो कलेक्टर डॉक्टर, परेशान ना करो
ये छोटे बच्चे हैं टंग ना जाएं तस्वीरों में।
बड़े होकर चले जाते हैं बच्चे रोटी कमाने
मेहमान बस रह जाते घरों की तकदीरों में।
दिल मत लगाना तुम, वो रुकता कहाँ है
उसकी गिनती है पक्के राहगीरों में।
आशिक़ी से पहले हम भी बहुत हँसते थे
अब गिनती होने लगी जो गंभीरों में।
एक मैं ही हूँ जिसे रिश्ता कायम रखना है
दिखता कुछ भी नहीं तुम्हारी तदबीरों में।
जिनको चाहो उन्हें जताना पड़ता है
महबूब मिलते नहीं भजन मंजीरों में।
एक मंजिल है जिसे वर्षो से पाना है
रस्ते बदल बदल के शामिल हूँ राहगीरों में।
बीवी कभी पूछे तो यही बोलना
ढूंढकर लाये हैं तुझे लाखों हीरों में।
हाँ में हाँ मिलानी होती है उसकी
लाला खेला नहीं करते उड़ते तीरों में।
मुझसे बचकर रहा करो मेरी जान
एक ज्योतिषी ने बताया , हैं दो शादियां मेरी लकीरों में।
जो तेरी नज़र में बिजलिया कहाँ शमशीरों में
जल जाएँ डटे रहें सब्र कहाँ नये आशिक़ अधीरों में।
Sunday, October 26, 2025
चाँद को देखकर
ये जो चाँद को यूँ तकते हो
दो चार तो आँखो में रखते हो,
खो जाते हो आसमान में कहीं
गालों पर बहते हो अटकते हो ।
मुहब्बत में उसकी हो सरोबार
उसके बदन से भी टपकते हो ।
ये माहताब तुम्हारे घर भी आता है
मालूम है उसका हाथ झटकते हो ।
आफताब से लेते हो रोशनी
पर लाज़मी खूब चमकते हो ।
कौनसे सवाल परेशान करते हैं
क्यों बार बार सर झटकते हो ।
Thursday, September 25, 2025
आप भी ना . . .
नेकी के बदले नफ़ा माँगते हो, आप भी ना
वफ़ा के बदले वफ़ा माँगते हो, आप भी ना।
वोट देकर मांगते हो रोटी और रोजगार
क्या ये हर दफ़ा माँगते हो, आप भी ना।
ग़रीब लूटे दिल तोड़े किए पाप बेहिसाब
गंगा नहाकर फिर क्षमा माँगते हो, आप भी ना।
पहले वाले तो वापिस किये नहीं अब तक
और दे दो उधार ये क्या मांगते हो, आप भी ना।
उम्र तुम्हारी ढल गयी तोंद भी निकल गयी
आशिक़ मगर छरहरा मांगते हो, आप भी ना।
खुद में हो चाहे हज़ारों ऐब भरे
महबूब मगर खरा मांगते हो, आप भी ना।
इश्क़ कर लिया है जब इस उम्र में तो क्या
अक़्ल वालों से मशवरा माँगते हो, आप भी ना।
हिंदी हिन्दोस्ता का खाते पीते ओढ़ते हो
ऑरेंज कहकर संतरा मांगते हो, आप भी ना।
बचपन से पढ़ाकर अंग्रेजी में बच्चों को
अब क्या ये हिंदी हिंदी की जबां मांगते हो, आप भी ना।
स्वार्थों के बस काट डाले जंगल सभी
अब साफ़ सुथरी हवा माँगते हो, आप भी ना।
उसे तो छोड़ा था बड़े गुमान में तुमने
उसी के जैसा मिलने की दुआ मांगते हो, आप भी ना।
हर तरफ़ जंग है और तबाही का मंजर
बस गुलाब के काँटों हेतु सजा मांगते हो, आप भी ना।
तुम्हारे पाँव के नीचे ज़मीन भी खिसक चुकी
चाँद सितारे आसमाँ माँगते हो, आप भी ना।
जुल्म जो हमने किए ही नहीं कभी
उन्ही के लिए सजा माँगते हो, आप भी ना।
जब भी मिले परायों की तरह बेदिली से
अब रूह से राबता मांगते हो, आप भी ना।
है वो पत्थर सारी दुनिया को है खबर
उसके इश्क़ होने की दुआ माँगते हो, आप भी ना।
ये दरिया तो हैं सारे के सारे समन्दर के
समंदर से ही इनके लिए धरा माँगते हो, आप भी ना।
तूफ़ानों में जब दिया जलाकर बैठ गए हो
फिर आंधीयों से दवा मांगते हो, आप भी ना।
मिलने के लिए कितने व्रत कितनी ख्वाहिशें
फिर बिछुड़ने की दुआ मांगते हो, आप भी ना।
Sunday, August 31, 2025
अपना. .
लिखते लिखते एक कविता रह गई
उगते उगते सूरज हिस्से आया,
कुछ बातें मन ही में रही
ऊपर से मौन अंदर में समाया ।
किसी सुनहरी शाम में
चाँद पर हमने लुटाया सरमाया ।
वो पहले ऐसा नहीं था
सभी ने उसी कितनी बार बताया ।
जिंदगी जो जीने की चाहत है
उसकी आँखो ने वो क़िस्सा सुनाया ।
वो बिखरा नहीं था अब तक
ख़ुद को उसने भरोसा दिलाया ।
एक सितारे ने जो टूट कर
उसे अपना हिस्सा बनाया ।
Monday, August 25, 2025
नूर बरकरार है
बस एक परत आ गयी थी बादलों की
नूर तो अभी भी बरकरार है,
हमेशा के लिए नहीं छुपता
ये सूरज का धरा पर उपकार है ।
ये बहुत अनुभवों से आये हैं जानां
चेहरे पर जो लकीरों के उभार हैं ।
कल भी ये नज़रें ढूँढती थी तुम्हे
आज भी तुम्हारा इंतज़ार है ।
चाँद को शिकायत है तुमसे
रोशन ज्यादा तुम्हारे दीदार है ।
वो समंदर तट बाट जोह रहा हमारी
सूरज जहां जाता होके बेक़रार है।
किसी अलसायी शाम का डूबता सूरज
हमें गले लगा के देखो उम्र का उपहार है ।
उसकी सीधे सूरज से गुफ्तगू है
गरीब के मकान में कहाँ दीवार है।
वो अब घर से निकलता नहीं
जाने उस पर कितनो का उधार है।
जो अब भी अकड़ के चलता है
अफसर सुना है ईमानदार है।
थोड़ा ठहर के देखे हसीन दुनिया
क्यों ये मन घोड़े पर सवार है।
सूरज की हौड़ लगी वक़्त से
देखो किसकी मजबूत सरकार है।
माहताब की रोशन रात में मिलो
चर्चे होंगे जिंदगी कितनी गुलज़ार है ।
हम तुम कोशिशों के पुलिन्दे हैं
वक़्त सबसे बड़ा कथाकार है ।
@प्रेरित


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