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मैं तेरी जान हुआ कब था..............

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इश्क़ आसान हुआ कब था  मैं तेरी जान हुआ कब था,  यूँ मिलके अजनबी हैं दोनों  हमारा एक मकान हुआ कब था ? मिलने पर बेहद नेक लगा   ऐसा की, ऐसा इंसान हुआ कब था, उसके हृदय में घर था मेरा   फिर वहां मेहमान हुआ कब था ? गर मैं नहीं तुम तो सुलझे थे   बिछड़ के समाधान हुआ कब था ? तू समझ में आया धीरे धीरे  छोड़ा तो हैरान हुआ कब था? मैं सकते में था उसे देखकर  पीठ का वो निशान हुआ कब था ? फिर जैसे तोडा दिल उसने  इतना  हैवान हुआ कब था ? दीवारें खींचती चली गयी दरम्यान  जंग का एलान हुआ कब था ?

मेमोरी डिवाइस के कोने की तस्वीरें

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हम ढूंढते रहे हैं  बहुत सी अनदेखी जगह विचरते रहें हैं  संसार में मकसद बे मकसद,  कितने स्थान, लोग, पहाड़  झरने, पानी, समंदर सूरज और चाँद    जो तस्वीरों में कैद हैं  पड़े रहते हैं ऐसे ही किसी  मेमोरी डिवाइस के कोने में, जैसे गुजरे वक़्त में हमने  बसाये थे हज़ारों लम्हे  लाखों यादें  हमारे ह्रदय में, खोजने पर ही मिलते हैं  अब वो चित्र जो बंद हैं  किसी डिवाइस में या मन में परत दर परत नीचे दबे हुए, वो भी तब जब सही अलगो लगा हो  सर्च में और दिमाग में नहीं तो एक जैसी  अनगिनत छवि हैं  जो असली खोज को  इतनी देर तक बाधित  कर देती हैं  कि उम्र गुजर रही होती है  और हम तकनिकी पिछड़ेपन  के घेरे में फंस जाते,  बदन पर इतने मौसमों की मार  झेलते झेलते  परतें पाट नहीं पाते, वो तस्वीरें और यादें  गडमगढ़ सी, नहीं मिलती फिर  जैसे भूले पासवर्ड के बाद   जब हार्ड रिसेट करो तो सारे अवरोध ख़तम तो हो जाते  बस बहुत सारे हिस्से भी मिट जाते हैं  दिलो दिमाग के साथ भी  ऐसा ही...

नासमझ

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काश हर कोई  इस हद्द तक  नासमझ हो  कि वो यही विचारे  मैसेज का जवाब इसलिए नहीं  आया क्यूंकि  जिस से वो प्रेम करता है वो  फिलवक्त बहुत व्यस्त है,  उसने कॉल नहीं उठाया  क्यूंकि उसके आमने सामने  बहुत सारे लोग  टकटकी लगाए उसे देख रहे होंगे, वो शहर में आकर  सुचना नहीं भेजता  क्यूंकि उसका  शेडूल बहुत टाइट होगा, वो घर के पास से  बिना मिले चला गया  क्यूंकि रुकता अगर  तो बहुत देर हो जाती  गंतव्य तक पहुँचने में, वर्षों तक  इस तरह कोई  नासमझ बना रहे  तो बस खालिस प्रेम  उस से ये सब करवाता  होगा रे निष्ठुर !!

उसे जाना नहीं रुकना है...........

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वापसी की टिकट  नहीं करवायी थी उसने, जब तुमने पूछा  जाने का क्या करोगे   उसने धीरे से कहा  अभी सोचा नहीं है, उसे जाना नहीं  रुकना है।    तुमने भी रोकना ही चाहा था   वो आँखे, कांपते होंठ, घेरती बाहें  सब यही कह रहे थे,  पर मन को मजबूत कर  ह्रदय को समझा कर  उसने कहा मैं देखूं  कौनसी बस में टिकट मिलेगी, इस बात से जुदा  उसे जाना नहीं  रुकना है।  अपरिहार्य  है जीवन चक्र में मिलना  जिसे रचा है   प्रकृति ने, और वो चाह रहें  दो किनारों की तरह  पूरक बन बहते हुए  ना मिलें, बस राह दिखाते रहें  पानी को समंदर से मिलाने की  अलबत्ता  उसे जाना नहीं  रुकना है।  जैसे वर्षों से  किसी पहाड़ पर  जमी हुयी बर्फ  वहीँ रह जाना चाहती है  उसे नहीं बहना  तरल होकर समंदर तक  ऐसे ही  जीवन के ठहराव का आलिंगन बन  उसे जाना नहीं  रुकना है।    

मशहूर है फकीरों में............

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जितना लिखा नहीं होता लोगो की लकीरों में  कुछ लोग बाँट देते हैं उतना फकीरों में।   उसके घर से कोई खाली नहीं जाता  हालांकि शामिल नहीं है वो पैगम्बर पीरों में।   सब तो बेईमान नहीं निकलेंगे  कुछ लोग तो होंगे शरीफ भी अमीरों में। ताजमहल की नीवं खुदवाओ तुम  देखना हो जो मजदूर कितने दबे जागीरों में।  जमीनें बेचकर ख़रीदे घर पक्के जिन्होंने  उनकी धुप बारिशें खो गयी तअमीरों में।  (इमारतें )   खुद खामोश रहता है वो चित्रकार  पर बहुत सच बोलता है तस्वीरों में।  ये सियासतों के खेल बंद भी करो  बहुत लाल दे दिये मांओं ने कश्मीरों में।   उड़ना हमने बेटियों को सिखाया ही नहीं   शर्म, इज्जत, पगड़ी बाँध रखा कितनी जंजीरों में।  छोडो कलेक्टर डॉक्टर, परेशान ना करो  ये छोटे बच्चे हैं टंग ना जाएं तस्वीरों में।  बड़े होकर चले जाते हैं बच्चे रोटी कमाने  मेहमान बस रह जाते घरों की तकदीरों में।  दिल मत लगाना तुम, वो रुकता कहाँ है   उसकी गिनती है पक्के राहगीरों में।    आशिक़ी से ...

चाँद को देखकर

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ये जो चाँद को यूँ तकते हो दो चार तो आँखो में रखते हो, खो जाते हो आसमान में कहीं  गालों पर बहते हो अटकते हो । मुहब्बत में उसकी हो सरोबार  उसके बदन से भी टपकते हो । ये माहताब तुम्हारे घर भी आता है  मालूम है उसका हाथ झटकते हो । आफताब से लेते हो रोशनी  पर लाज़मी खूब चमकते हो । कौनसे सवाल परेशान करते हैं क्यों बार बार सर झटकते हो ।