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Showing posts from October, 2019

ओ रे निष्ठुर ।

रातों की नींदें वो सारे बहाने उड़ाने घृणा,ईर्ष्या इच्छाएं, सवाल, स्वप्न और उनको पूरा करने को जोड़ बाकी का गणित सब तुम्हारे आकर्षक बलिष्ठ बदन को छू सकने के निमित्त हैं, तुम्हारे होंठ विनाश को आमंत्रित करते हुए कितने रसीले हो जाते हैं तुम्हारी उष्णता ओह वो मेरे हर एक रोम रोम में बस गई है तुम्हारी खुशबू टपक रही है बदन के हर हिस्से से शाश्वत प्यार तुम्हे पाने की चाह है अथाह, वो छुअन तुम्हारी और मेरा समर्पण यूं लम्हों में बस तुम्हारा होना सारी हदें तोड़ने की चाहत बदमाश उंगलियों की मंजिले अनकही अग्न कुछ तो बुझा जा आजा फिर से गले लगा कुछ अनसुलझे मुद्दे सुलझा आ फिर से आ ओ रेे निष्ठुर !

ओ रे निष्ठुर . . .

तुम जिस कदर मेरे पास हो डर लग रहा है खोने का सोचता हूं पूछ लूं तुम्हे चले तो नहीं जाओगे, फिर सोचता हूं कितने सवाल है मन में, पूछना क्या है कौनसा सवाल सही बौखलाया हुआ हूं हो सकता है मैं शब्द दर शब्द गलत हूं लिखते हाथ कंपकंपा रहे हैं और मैं डरा हुआ हूं तुम बस चले मत जाना ओ रे निष्ठुर ! 

ओ रे निष्ठुर -फिर से !

सुनो तुम्हें देखकर बादल बारिशें भूल गए हैं इन्हें यहीं बरसना था पर वो खो गए हैं तुम्हारी गहरी आँखों में और खोज रहें हैं रास्ता तुम्हारे हृदय तक पहुँचने का अनवरत, सतत, ये मस्त सी हवाएं रास्ता भटक गयी हैं इन्हें यहीं करना था मौसम खुशगवार और हंसी पर वो उलझ गयीं हैं तुम्हारे सुलझे से बालों में और बसना चाहती हैं वहीँ हमेशा, अनंत, और ये बिजलियाँ खो चुकी हैं रोशनी इन्हें चमकना था यहीं लिपट के बादलों से पर वो तुम्हारे बदन से निकलती आंच के सामने धूमिल हो चली हैं और अपना वजूद बचाने को समा गयी हैं तुम्हारे अन्दर जीवन पर्यंत, तुम बारिश, बादल ,दामिनी सी लिपटकर अनकही प्यास पिपाषित की बुझाओ ओ रे निष्ठुर !