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Showing posts from November, 2011

लैटर पैड सी........

लैटर पैड सी........   क्षण    पहर   दिन गुजरे  स्वयं में डूबकर  गहन सोच विचार के बाद कुछ अक्षर  कागज पर उभरे    फिर दो चार तहकर    कागज को बंद कर दिया    एक दुसरे कागज में    जीवन जैसे बंद हो गया हो      खाली भरे मकानों   दुकानों   और ऑफिसों में   कुछ मोहरे लगाईं गयी   गंतव्य पर पहुंचा    या फिर  पहुँचने से पहले ही  फट गया    कि फटना जैसे नियति हो   अलबत्ता गोचर हुआ  जैसे जातियों के ठप्पे लगा दिए हो    इंसानों पर   और छोड़ दिया गया हो   सांडो कि तरह   लड़ने मरने के लिए   अपने संतापों से उबर   कोई मनुष्य   पुराने पत्र को फाड़कर जै से फिर तैयार हो  एक नया नाम लिखने को   जिंदगी भी है ....एक लैटर पैड सी !!!

मिट जाएगी .....बरबस !

तुम कहना तो चाहती हो बहुत कुछ मद्धम मद्धम कंपकंपाते होठो से ये हिलते हैं धीरे से सरगोशी खुद से और फिर कुछ कहने से पहले ही बंद हो जाते हैं, जैसे झीनी सी हवा दो बेहद पतले से पत्तो को हिलाकर पास लाकर फिर दूर कर देती है और वो अनथक पर्यास करके भी मिल नहीं पाते, इनायत जाने इन होंठो की कब मेरी किस्मत सजाएगी जब ये खुद-ब-खुद हंसी का शेहरा पहनकर  मेरे अथ्रुयो से लिपट जायेंगे, जंगल में अनायास जैसे कोई बेल बढ़ते बढ़ते लिपट गयी है अपने पेड़ से और अब जिन्दा रहेगी उसी पेड़ के साथ जुदा होने पर मर जाएगी मिट जाएगी .....बरबस !

कुछ पंक्तिया ...यूंही यदा कदा............

कुछ पंक्तिया ...यूंही यदा कदा............ ऐ- चाँद  तू  होंसले  बुलंद  रखना    शर्त  तुझसे  किसी  ने  लगा  रखी है, चांदनी  तेरी  मंद   पड़ेगी  लाजिमी वो  अपने  महबूब  के  प्रेम   में  नहा  रखी  है आज  फिर  से  एक  पुरानी कविता  ले  बैठे  जो  हम वफ़ा  का  एहसास  जाने  क्यों  शर्मिंदा  हो  गया, पार्क  के  तिनके  जो  साथ  में  तोड़े  थे  हमने    हर  तिनका  तेरी  यद्  में  जिन्दा  हो  गया, खैरात  नहीं  है  दोस्तों  य...

आँख में जो रह रहा है.....

इन नर्म सर्द हवाओ में जो बह रहा है, है किसी गरीब का आंसू न चाह कर भी आँख में रह रहा है, सपने संजोये कुछ काटे कुछ बोये अधूरे से खाव्बो की खातिर न जाने हम कितने रोये, हर दिन टूटे उसके ये ख़्वाब अरे सुनो तो जरा ख्वाबो का टूटना कुछ कह रहा है, गरीब का आँसू न चाह कर भी आँख में रह रहा है, रात भर जो चाँद को देखा उसने सनसनाती सर्दी में छुप गया शर्मिंदगी से बादलों में, पता है उसे की सुबह संग पसीने के मेहनत जीतेगी और वो हारेगा देखो यही वो बादलों से कह रहा है है गरीब का आंसू न चाह कर भी आँख में रह रहा है,

खुद के न बस में हू.....

कहू  कैसे की  कशमकश  में  हू प्यार  में  हू  खुद  के  न  बस  में  हू ढल  गयी  है  शाम, पर  उसने  सुबह  कहा  था है  क्या  अब  भी  असमंजस  में  हू .... जब  साथ  थे  तो  प्यार  की  बाते  ऊपर  से  गयी दूर  हो  तो  वो  ही  बाते  आंख  भर  गयी मैं  इश्क  विश्क  की  बातो  में  पड़ता  न  था पर  जाने  तेरी  ये  बाते  क्या  बात  कर  गयी..... तेरी  खुशबू   सी  आई  है  चमन  में, है  तू  कही  आस  पास ...

जाने क्यों तुम्हे लगा आज ....

वक़्त की चमक इन आँखों में प्यार का हर सबक इन आँखों में जाने क्यों तुम्हे लगा आज  हम बदले से हैं, जी जान आँखों में/ है वही प्यार हमारी आँखों में  गहराता इंतजार आँखों में  है शायद बात नहीं कोई  यही बात हमारी आँखों में, समाया काम का बोझ आँखों में जाने कितनी सोच आँखों में है वही नदी, किनारा, हवाए भरा सब जोश इन आँखों में, गर जान नहीं दिखी आँखों में है तुम्हारी पहुँच आँखों में भर नजर प्रेम से देखा होता फिर दीखता सब मदहोश आँखों में वक़्त की चमक इन आँखों में प्यार का हर सबक इन आँखों में जाने क्यों तुम्हे लगा आज  हम बदले से हैं, जी जान आँखों में/

अब मैं चूका हूँ........

 है  रोटी  नहीं  पास  मेरे  और  मैं  भूखा  हूँ , हूँ  वही  पुराना  पेड़  पर  बिन  पानी  के  सुखा  हूँ  ... बहुत  दिनों  दे  दी  छाया  बहुत   दिए  फल  मैंने , सब  तेरा   है  अब  संभाल  इसे मैं  कितने  सालो  से  झूका  हूँ... महंगाई  यूँ   बढती  गयी टहनिया मेरी  घटती  गयी पाला  मैंने  तुम्हे  जवान  किया हुई  उम्र  बहुत  अब  मैं  चूका  हूँ ... देखता  हूँ  भ्रष्ट  भूख नेता  और  नीति की, जगारीति की हूँ  सबसे  बुढा...