पहले जैसा कहाँ
जो बह रहा, हवा का झौंका है की क्या है न मुझको पता है न कोई गुमाँ है, कैसे निकला है सूरज ये अंगड़ाई लेके फिर क्यों उदासी का ये सिलसिला है, जाने कहाँ से इठलाती बहार आ गयी है पर जो आँखों से बह रहा है वो क्या है, कब से तुम जा चुके हो यहाँ से हर एक आहट पे दिल क्यों जवाँ है , कैसे कह दू की तुम लौट आओ सब कुछ यहाँ पहले जैसा कहाँ है