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Showing posts from November, 2015

एक मौका तो दो ..........

कैसा बेजान सा खेल है तेरा मेरा कहाँ मेल है। हर दुआ में तुम हो ह्रदय का अजब खेल है। कसूरवार  हूँ मैं प्रिय जिंदगी धक्कम -पेल है। भूलने का हर प्रयत्न अब तक तो फेल है। बिन मिले चल रही ये जिंदगी की रेल है। एक मौका तो दो तुम बिन जिंदगी जेल है।

ओ रे निष्ठुर.....12

वो शाम गजब ढली मय सी घुली थकन से उभरी आँखों में पसरी थोड़ी सी भीगी तुम्हारा पहलू और जानलेवा चन्द्रमा कि चाशनी से टपकते तुम ! शहद बदन यौवन छन छन मेरा समर्पण तेरा आलिंगन रात कि आहट कहो कैसे सहलूं और जानलेवा चन्द्रमा कि चाशनी से टपकते तुम ! मेरी आशाएं तुम्हारी इच्छाएं दानव विचार गयी मैं हार महकती हूँ अब भी तुमसे कहलूं अब भी उस चाशनी में रत हूँ बस तुम नहीं टपकते हो अब ! कभी फिर से चन्द्रमा बन अपनी चाशनी में भिगोने आओ तो ओ रे निष्ठुर !!

पास है क्या............

खंडित प्रेम में आस है क्या तू है मगर, मेरे पास है क्या ? मुंडेर झांकती बेरंग तस्वीर रिश्तो में अब भी खटास है क्या ? जिंदगी को रंगो मेरे रंगरेज़ समर्थ हो तुम्हे अहसास है क्या ? एक पत्थर की दूरी पे रहते हो  मिलने की कोई प्यास है क्या ? मर रहे है हम धीरे से क्रमशः  तुम्हे होशो-हवास है क्या ? तुम न बोलो, जिंदगी दोजख   इससे भी जीना बकवास है क्या ? मेरे तो आदि अंत तुम्ही हो  तुम्हे किसी कि तलाश है क्या ? क्षीण हो रही है देह मेरी  प्रेम शुद्ध बचा आभास है क्या ? खंडित प्रेम में आस है क्या तू है मगर, मेरे पास है क्या ?