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Showing posts from September, 2014

कीमत घटने लगी......

गर्द चेहरों से हटने लगी जब धुप यूँ छंटने लगी, देख कर  बेटे का कद ऊँचा बाप की मूंछे बढ़ने लगी, बेटा जब गया बाहर माँ की आस घटने लगी. बोया भाव आसमां पर कटा तो जमीं धँसने लगी, हुआ है प्यार में पागल देखो दुनिया हंसने लगी, कह गया अलविदा वो छाती यूँ फटने लगी, ना दिखा नखरे नवाबी अब कीमत तेरी घटने लगी, ये इश्क का बाज़ार है दिलों की शतरंजे सजने लगी, आ गया वो मैकदे में बज़्म फिर महकने लगी।

शर्मिंदा न हो प्यार पे.........

लग रहा है बुरा तो लगने दे  छोड़ दे उसे  भटकने दे  यूँ शर्मिंदा न हो प्यार पे।  है अगर तो  दम्भ भर  हो समर्पित  निश्चिंत हो कर  वो प्यार क्या  जो फ़िदा न हो यार पे। तन बंटा  मन भी बंटा   और बांटोगे क्या  ये मेरा ये तेरा  काट दिए अंग अंग  और काटोगे क्या  होंसला रख उफ़ न हो वार पे।       

कहानी - "चला गया....."

कहानी - "चला गया....." 'इनसे पैसे निकलवाना पागल कुत्ते के मुंह से हड्डी निकलवाने जैसा है।  पहली बात तो निकलवा नहीं पाओगे अगर कामयाब हो भी गए तो भी रेबीज वाले इंजेक्शन पक्का लगेंगे। ' हाँ भाई सही कह रहे हो, कम-स-कम पच्चासियों चक्कर तो मैं भी लगा चुका हूँ। अब देखो बिना किसी अप्रूवल के इन्होने प्रोजेक्ट का इश्तिहार दिया। लोगों से पैसे जमा करवाये। उनके साथ एग्रीमेंट किया। आज दो साल के बाद भी न फ्लैट दीखता है और ना ही पैसे वापिस मिलने के आसार। बहाने पर बहाने लगाए जा रहे हैं।  अब कौन कोर्ट कचेहरी के चक्कर में फंसे।  बहुत मुश्किल है इन भू माफिया लोगों से लड़ना।  यूसुफ़ ने कहा। एक बुजुर्ग दम्पति बड़े गौर से हमारी बाते सुन रहे थे।  दोनों की उम्र सत्तर से ऊपर रही होगी।  चेहरे पर मायूसी के साथ थकान भी झलक रही थी। एक बड़ा सा झोला महिला के कंधे पर था जिसके वजन से वो बैठ कर भी एक तरफ झुकी थी परन्तु झोला अब भी किसी लाडले बेटे सा उसके कंधे पर टिका था। बुजुर्गवार शायद संसार के कड़वे अनुभवों से लदे होने की वजह से झुके हुए थे।  दोनों के चेहरों को देखकर...

कुछ ख्वाहिशें ..........

देखिये कुछ ख्वाहिशें उसे हँसाना चाहती हूँ खुद भला हूँ जितनी  उदास उसके लिए कुछ गुनगुनाना चाहती हूँ, बहुत रातों से जगा है शायद थका डरा सा वो मेरा सगा है शायद पलकों से उसकी थकान मिटाना चाहती हूँ, रात भर ख्वाबों में आये खुद पसीजे मुझे हंसाये न कुछ वो समझे ना मुझे आये प्यार उससे बहुत थोडा समझाना चाहती हूँ, वक़्त की सब सौगातें क्या तन क्या मन की बातें डर तो मुझे खुद से हां ये भी सच है मगर उसकी हो जाना चाहती हूँ, हज़ारों बंदिशे खुद पर थोपी हैं थोथी हैं झूठी हैं मालूम मगर कभी कभी तो इनको झुठलाना चाहती हूँ हाँ मैं तेरी हो जाना चाहती हूँ तुझे हँसाना चाहती हूँ।

देखूं कैसे........

ख्वाब तेरे साथ तेरा पल पल तेरी बातों ने मन को घेरा, तुझ संग महके सावन छुअन तेरी  तन पावन शेष नहीं कुछ भी मेरा, मेरे अरमान मुस्कान पहचान सब में बस तेरा डेरा, मन की चाहना सीढ़िया तन की मैं मन हूँ प्रिय और तू तन मेरा  तुझ बिन देखूं कैसे सवेरा,

निश्चिन्त रहो .....

तुम्हे छुपा रखा है अंदर बहुत सारी छालों में सर्दी गर्मी धुप छाँव बारिश से बचाते हुए, बुरी हवा नहीं फटकेगी तुम्हारे पास जब तलक पता ना चले  बुरा-  भला क्या निश्चिन्त रहो बस, आँखों से अश्क़ जाया ना जायेंगे होंठ कापेंगे नहीं आवाज़ उठाने को सज रहो बस, मैं वो बरगद हूँ जिसकी जड़ें तुम हो और मैं अपना सारा सामर्थ्य लगा दूंगा तुम्हारी खातिर मेरी बच्ची निश्चिन्त रहो बस।

ओ रे निष्ठुर !!

अच्छा सुनो अब नहीं आती मुझे याद तुम्हारी, न ही नसों में सरसराहट होती है तुम्हारे नाम से, मेरे रुख्सारों पर तितलियाँ नहीं बनती तुम्हे सोचते हुए, तुम्हारे हिस्से का सोचते सोचते सुन्न हो गये सब, हजारों दफ़ा आये ख्वाबों में तुम हजारों दफ़े तुम्हे ज़िंदा करते करते जान चली गयी ओ रे निष्ठुर !