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इश्क़ झूठा ही सही।

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आसमां के पार शाही रथ पे सवार मन मुदित मुदित, इश्क़ झूठा ही सही। सागर लहरें नाव तुम पतवार हृदय गये हार, इश्क़ झूठा ही सही। आँखे लब जुल्फ होते जाते वार सबर जार जार, इश्क़ झूठा ही सही। ग़ज़ल सी शाम और यादों की बयार है फिर एक बार, इश्क़ झूठा ही सही। ले चलें तुझे तोड़कर जुनूं की रफ़्तार जग आर पार, इश्क़ झूठा ही सही। चल करें खुद पर भी थोड़ा एतबार हो जाएँ सरोबार, इश्क़ झूठा ही सही।

बिन सुनी अर्जियों से तुम

इश्क़ मेरी हर सांस में सुलग रहा   राख बन बुझ गए, सदियों से तुम। जमीं से आसमां छूने की ज़िद मेरी खाक हुए, बिन सुनी अर्जियों से तुम। मेरे तेरे दरम्यां जो ख़ामोशी तन गयी एक ठिठक सा मैं, बर्छियों से तुम। मेरी लेखनी का भाव, आरम्भ, अंत हो    ग्लानि छोड़ रंगो मुझे मस्तियों से तुम।