Posts

Showing posts from July, 2015

थोडा दूर अब हुआ जाए ..........

 थोडा दूर अब हुआ जाए  उस तक बस मेरी दुआ जाए।  दिल के रास्ते बंद ही तो थे   क्योँ गिला उससे रखा जाए।  कब की है दिल्ली ने वफ़ा   याद उसकी फिर भी रुला जाए।  चल सबक ले अब तो यारा  विश्वास कब कहाँ किया जाए।  धरा की आस पे कब बरसे बादल  जिसको जाना है चला जाए।  आते नहीं थे गम के गीत मुझे लिखा गुनगुनाया सिखा जाए। 

आशाएं तो हैं .....

आशाएँ  जिन्दा हैं  तभी तो मैं और तुम  सांस ले रहे हैं रिश्ते टूटने की वजह  नहीं हैं ये  रिश्ते बनते हैं  और वो फुसफुसाते हैं  एक दुसरे के कान में  की हम ज़िंदा हैं  आशाएँ हैं ना।  वर्षो बाद  आज भी  रिक्त प्रेम के रंगों वाले उस  उस चित्रकार  और उसके ख्यालों ने  प्रेम भंवर बना रखा है   जिंदगी के कितने पन्ने  लिख दिए हैं तुमने  उसके नाम  आशाएँ हैं ना।  अँगुलियों  पर गिनो तुम रिश्ते  फिर उनसे बेलों की तरह लिपटी  आशाएँ  बेटी से इज्ज़त की  भाई से रोटी की  बहन से प्रेम की  पिता से आदर्श की  माता से वात्सल्य की  गिनो फिर से  कितने प्रगाढ़ रिश्ते  कितनी आशाएं  गिनो  आशाएं हैं ना।  हाँ  कभी कभी  रिश्तों आशाओं के द्वंद्व में  एक का अतिक्रमण दुसरे पर भारी  पड़ता है  अब जो गैरजरूरी है  बेनामी है   जिसे कहना नह...

ओ रे निष्ठुर-9

तेरे आने से मेरे शहर का  रेलवे स्टेशन  कितना महक गया था  कोने में पड़े  गन्दगी के ढेर से  गुलाबों की खुशबू  उमड़ रही थी, चप चप  समोसे खाती  स्टेशन के  द्वार पे बैठी बूढी औरत  सावन की पहली बारिश  वाली बूंदों की  अठखेलियों को  मात दे रही थी,  तेरे इंतज़ार का  हर लम्हा  खूबसूरती की हदें  लांघ गया  वैसी रगों में सरसराहट  सच बात है  आज तक नहीं दौड़ी  कभी फिर से  मेरे शहर को  महकाने आ बिन बारिश के  वैसा अहसास  जगाने आ  आ कभी तो  ओ रे निष्ठुर !!

अधूरी कविता .....

देख आज मैं हार गयी जमाने की हर बात सोचकर किसी खड्ड के पानी में सड़ती मरी कोई  मछली सरीखा तेरा मेरा रिश्ता  कर मैं जार जार गयी, देख आज मैं हार गयी,   जाने क्या क्या सोचा होगा तूने क्यूँ जोड़ा क्यूँ तोडा क्या बाकी था क्या वसूला क्यों कर सब मैं तार तार गयी देख आज मैं हार गयी,   ह्रदय रोया आंसू रोये रोया तकिया रोया बिस्तर मेरा रोम रोम रोया   क्या दिया इस जग ने खातिर जिसकी मैं अपना सब कुछ वार गयी देख आज मैं हार गयी ।       

अच्छा लगा.....................

तेरा यूँ चले जाना अच्छा लगा  वो जाने का बहाना अच्छा लगा ।    बहुत दी होंगी जमाने ने शिकस्तें  तेरी जीत का निमित बन जाना अच्छा लगा ।   प्यार नहीं समझौता किया था तुमने   आज दिल का टूट जाना अच्छा लगा ।     आत्मग्लानि से भरा तेरा आलिंगन  बाँहों का छिटक जाना अच्छा लगा ।    दोस्ती भी न निभा पाये तुम तो  खुद पे तरस खाना अच्छा लगा ।    प्यार से दोस्ती और फिर बेरुखी  रिश्तों का बदल जाना अच्छा लगा।    सवाल कितने बिन जवाबों के  कभी पूछेंगे ये फ़साना अच्छा लगा।    कितने गहरे शूल चुभे फिर भी   तेरे लिए दुआओं का खजाना अच्छा लगा।    मैं और मेरी दहशती आवारगी  इनमें आज डूब जाना अच्छा लगा ।     

कर सकोगे न.........

सुनो प्रेम करते करते अब हमारा रिश्ता बदल गया है न, तुम मुझ जैसे और मैं तुम जैसी हो गयी हूँ न, फिर आजकल अपने से क्या बतियाते हो अब हम प्रेमी नहीं हैं तुम्हे यकीन है न, प्रेम हेतु तुम्हारा अकेले और मेरा होना कितना जरुरी था अब तुम्हे पता है न, बाँट पाना संभव कहाँ प्रेमी होने की पात्रता  तुम्हारे पास थी ही नहीं जानते हो न, अब हम बदल रहे हैं मित्र हुए मित्रता निभा पाओगे तुम कर सकोगे न।