लिखते लिखते एक कविता रह गई
उगते उगते सूरज हिस्से आया,
कुछ बातें मन ही में रही
ऊपर से मौन अंदर में समाया ।
किसी सुनहरी शाम में
चाँद पर हमने लुटाया सरमाया ।
वो पहले ऐसा नहीं था
सभी ने उसी कितनी बार बताया ।
जिंदगी जो जीने की चाहत है
उसकी आँखो ने वो क़िस्सा सुनाया ।
वो बिखरा नहीं था अब तक
ख़ुद को उसने भरोसा दिलाया ।
एक सितारे ने जो टूट कर
उसे अपना हिस्सा बनाया ।
यूं मत तकाया करो मेरी तरफ, छोड़ते भी नहीं हो और जीने भी नहीं देते।
ReplyDeleteऔर हमारी हिस्सा
ReplyDeleteउगते उगते सूरज हिस्से आया॥ पढ़ते रहिए । कभी कभी नाम भी बताते जाईए
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