Sunday, August 31, 2025

अपना. .



लिखते लिखते एक कविता रह गई

उगते उगते सूरज हिस्से आया,

कुछ बातें मन ही में रही 

ऊपर से मौन अंदर में समाया ।

किसी सुनहरी शाम में 

चाँद पर हमने लुटाया सरमाया ।

वो पहले ऐसा नहीं था 

सभी ने उसी कितनी बार बताया ।

जिंदगी जो जीने की चाहत है 

उसकी आँखो ने वो क़िस्सा सुनाया ।

वो बिखरा नहीं था अब तक 

ख़ुद को उसने भरोसा दिलाया ।

एक सितारे ने जो टूट कर 

उसे अपना हिस्सा बनाया ।



3 comments:

  1. यूं मत तकाया करो मेरी तरफ, छोड़ते भी नहीं हो और जीने भी नहीं देते।

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  2. और हमारी हिस्सा

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  3. उगते उगते सूरज हिस्से आया॥ पढ़ते रहिए । कभी कभी नाम भी बताते जाईए

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