Saturday, January 28, 2017

अजनबी सा रहते हैं......

खुद में हम अजनबी सा रहते हैं
और लोग तुम्हें हमीं सा कहते हैं।


दरख्त कमजोर था जो टूट गया
हम दरिया जैसे एक सा बहते हैं।


पत्थरों पर जो उगे वो फूल हैं हम
नर्म मिट्टी को वरना जमीं सा कहते हैं।


जमाने से छुपा ले पर्दों की कारागरी है
नहीं तो जितने अपने हैं अजनबी सा रहते हैं।

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