Thursday, July 23, 2015

आशाएं तो हैं .....

आशाएँ 
जिन्दा हैं 
तभी तो मैं और तुम 
सांस ले रहे हैं
रिश्ते टूटने की वजह 
नहीं हैं ये 
रिश्ते बनते हैं 
और वो फुसफुसाते हैं 
एक दुसरे के कान में 
की हम ज़िंदा हैं 
आशाएँ हैं ना। 

वर्षो बाद 
आज भी 
रिक्त प्रेम के रंगों वाले उस 
उस चित्रकार 
और उसके ख्यालों ने 
प्रेम भंवर बना रखा है  
जिंदगी के कितने पन्ने 
लिख दिए हैं तुमने 
उसके नाम 
आशाएँ हैं ना। 


अँगुलियों 
पर गिनो तुम रिश्ते 
फिर उनसे बेलों की तरह लिपटी 
आशाएँ 
बेटी से इज्ज़त की 
भाई से रोटी की 
बहन से प्रेम की 
पिता से आदर्श की 
माता से वात्सल्य की 
गिनो फिर से 
कितने प्रगाढ़ रिश्ते 
कितनी आशाएं 
गिनो 
आशाएं हैं ना। 

हाँ 
कभी कभी 
रिश्तों आशाओं के द्वंद्व में 
एक का अतिक्रमण
दुसरे पर भारी 
पड़ता है 
अब जो गैरजरूरी है 
बेनामी है  
जिसे कहना नहीं आता 
उसे जाने दिया जाता है  
क्यूंकि 
उसे वहन करना 
बाकी सब की आशाएं तोड़ सकने को 
काफी है 
परन्तु 
आशाएं हैं ना।  




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