Sunday, May 24, 2015

ओ रे निष्ठुर- 4 !!.............


कुछ सपने
तुम भी जानो 
मालूम मुझे भी
सच होने को नहीं पाले जाते
बस वो होते हैं सपने
गर्व जिन पर होता
बिना उनके जिया नहीं करते।

कुछ भाव ह्रदय के
तुम भी जानो
मालूम मुझे भी
रहते हैं जिन्दा
दुनिया से लड़कर
टूटती जिंदगी
पर भाव नहीं मरते।

कुछ अपने
तुम भी जानो
मालूम मुझे भी
कहते उनको सपने
बताते भाव जिन्हें
खंड खंड उनको
अपने किया नहीं करते।

बुजुर्गो ने कहा
सपने अपने तभी तक
जब तक बंद हृदय में,
निकले तो टूटना लाजिमी,
भाव ह्रदय के बस तुम्हारे
तुम तक ही रहे
सपने कहे अपनों को कहे
भाव जब बता डाले

अपने
भाव
सपने
चटक रहे धीमे धीमे
कुछ तो कर

ओ रे निष्ठुर !!



 

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