तुम्हारी आँखो की भाषा
तुम से अलहदा है,
वो साथ नहीं देती
तुम्हारे इस सुनहरे चमकते बदन का,
हँसती गाती मुस्कराती हैं
खूब सारा प्रेम टपकाती सी,
उड़ जाना चाहती हैं
रंगों ख़ुशबूओं के संग,
रीतती नहीं हैं
विचारों मंथन और प्रेम की उलझनों से,
तुम्हारी आँखे बना देती हैं
एक भिन्न संसार आस पास,
लचकती बेले डांसर की
कमर के घुमाव समेटे नाचती हैं,
राग समां में घुलते
जब तुम तकती कनखियों से हौले हौले,
उकेर जाती ख़ाली कैनवास पर
प्रेम की अनकही कविता,
उनकी समझन भी
रोमांटिक ग़ज़ल के मर्म सी है,
बहुत जचतीं हैं करती हुई
अल्हड़ कुंवारी सी अटखेलियां,
गीले गीले कोर
बाहों के आलिंगन छूटते हों जैसे,
पलकें टिमटिमाती लगता
पहाड़ों पर आवारा बादल ने मारी गेड़ी है,
तुम्हारी आँखे नहीं बोलती
तुम्हारे होठों की भाषा,
तुम अलहदा बोलती हो
प्रेम को रिक्त कर !!!!







