Sunday, October 26, 2025

चाँद को देखकर

ये जो चाँद को यूँ तकते हो

दो चार तो आँखो में रखते हो,

खो जाते हो आसमान में कहीं 

गालों पर बहते हो अटकते हो ।

मुहब्बत में उसकी हो सरोबार 

उसके बदन से भी टपकते हो ।



ये माहताब तुम्हारे घर भी आता है 

मालूम है उसका हाथ झटकते हो ।

आफताब से लेते हो रोशनी 

पर लाज़मी खूब चमकते हो ।

कौनसे सवाल परेशान करते हैं

क्यों बार बार सर झटकते हो ।





3 comments:

  1. मोहब्बत की किताब को लिखते हो और मिटा देते हो, कौन कहेगा कि तुम जांनिसार लगते हो।

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  2. किताब जो लिखी गई ….उसे कैसे मिटाया जाये . .आप गर बात सको

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  3. सच है .............जो लिखा गया उसे कौन मिटा सकता है बस अपने अपने तरीके से मायने समझ लिए जाते हैं ॥ पढ़ते रहिए ॥ बहुत सा धन्यवाद ।

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