ये जो चाँद को यूँ तकते हो
दो चार तो आँखो में रखते हो,
खो जाते हो आसमान में कहीं
गालों पर बहते हो अटकते हो ।
मुहब्बत में उसकी हो सरोबार
उसके बदन से भी टपकते हो ।
ये माहताब तुम्हारे घर भी आता है
मालूम है उसका हाथ झटकते हो ।
आफताब से लेते हो रोशनी
पर लाज़मी खूब चमकते हो ।
कौनसे सवाल परेशान करते हैं
क्यों बार बार सर झटकते हो ।

मोहब्बत की किताब को लिखते हो और मिटा देते हो, कौन कहेगा कि तुम जांनिसार लगते हो।
ReplyDeleteकिताब जो लिखी गई ….उसे कैसे मिटाया जाये . .आप गर बात सको
ReplyDeleteसच है .............जो लिखा गया उसे कौन मिटा सकता है बस अपने अपने तरीके से मायने समझ लिए जाते हैं ॥ पढ़ते रहिए ॥ बहुत सा धन्यवाद ।
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