सबसे स्याह रात की कविता है ये
कसम से
तेरा इस से कोई वास्ता नहीं,
न चाँद है
न चाँदनी
न ठंडी हवा
न मधुर स्वर लहरी
बस बज रहें हैं
धना धन
तेरे बोल
मेरे कानों में
कोई और आवाज नहीं
गर है भी तो
बाकी सब के लिए
मेरे कान बहरे हुए हैं
आज की स्याह रात में,
कसम से
तेरा इस से कोई वास्ता नहीं।
ये दीवारें
ये तस्वीर
ये वक़्त
सब सुन्न हैं
साँय साँय करती
रगों में
गूंज रही है
बस तेरी बातें
मेरे अंग मेरा शरीर
इस रात से
लड़ पायेगा की नहीं
लाजिमी नहीं है
क्यूंकि मुझे कुछ भी
महसूस नहीं हो रहा
आज इस रात में,
कसम से
तेरा इस से कोई वास्ता नहीं।
तेरी बाहों में
जब संसार को भुला कर
तुझ में समा कर
सब न्योछावर कर
उन दुश्वार लम्हों को
अपनी अंजुरी में
समेट रही थी
तब तुमने
बड़ी सहजता से
किसी के प्यार का दम्भ
मेरे प्रेम पर
पहाड़ सा रखा
मेरी अंजुरी से
खिसक कर
प्रेम खो गया
संभाल न पायी
खाली बस निरी खाली हो गयी
मैं ही विमूढ़
स्याह रात में,
कसम से
तेरा इस से कोई वास्ता नहीं।
कसम से
तेरा इस से कोई वास्ता नहीं,
न चाँद है
न चाँदनी
न ठंडी हवा
न मधुर स्वर लहरी
बस बज रहें हैं
धना धन
तेरे बोल
मेरे कानों में
कोई और आवाज नहीं
गर है भी तो
बाकी सब के लिए
मेरे कान बहरे हुए हैं
आज की स्याह रात में,
कसम से
तेरा इस से कोई वास्ता नहीं।
ये दीवारें
ये तस्वीर
ये वक़्त
सब सुन्न हैं
साँय साँय करती
रगों में
गूंज रही है
बस तेरी बातें
मेरे अंग मेरा शरीर
इस रात से
लड़ पायेगा की नहीं
लाजिमी नहीं है
क्यूंकि मुझे कुछ भी
महसूस नहीं हो रहा
आज इस रात में,
कसम से
तेरा इस से कोई वास्ता नहीं।
तेरी बाहों में
जब संसार को भुला कर
तुझ में समा कर
सब न्योछावर कर
उन दुश्वार लम्हों को
अपनी अंजुरी में
समेट रही थी
तब तुमने
बड़ी सहजता से
किसी के प्यार का दम्भ
मेरे प्रेम पर
पहाड़ सा रखा
मेरी अंजुरी से
खिसक कर
प्रेम खो गया
संभाल न पायी
खाली बस निरी खाली हो गयी
मैं ही विमूढ़
स्याह रात में,
कसम से
तेरा इस से कोई वास्ता नहीं।
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