Tuesday, June 10, 2014

ज़हन में मुस्कराऊंगा.......

मैं समय नहीं जो लौटकर ना आऊंगा
हर वक़्त तेरे ज़हन में मुस्कराऊंगा।

बारिश नहीं तो किसान हल कैसे  जोडे
आएंगे बादल और फसल सा लहलाऊंगा।

दुत्कार फटकार चाहे जीना करदे दुभर
रहन तेरे अंदर है यहां से ना जाऊंगा।

जल्दी नहीं है बरसों में हाँ कर देना
दर पर तेरे फ़क़ीरी का डेरा लगाउँगा।

दिमाग भन्नायेगा नसें फटने लगेगीं
हर लम्हा जब याद बन सताऊंगा।

तेरी हर अरदास रब सुनेगा हरदम
परचम बन रब से भीड़ जाऊंगा।

मैं समय नहीं जो लौटकर ना आऊंगा
हर वक़्त तेरे ज़हन में मुस्कराऊंगा।










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