Friday, June 10, 2011

पहले जैसा कहाँ

जो बह  रहा,  हवा का  झौंका  है  की  क्या  है
न मुझको पता है न कोई गुमाँ है,

कैसे निकला है सूरज ये अंगड़ाई लेके
फिर क्यों उदासी का ये सिलसिला है,

जाने कहाँ से इठलाती  बहार आ गयी है
पर जो आँखों से बह रहा है वो क्या है,

कब से तुम जा चुके हो यहाँ से  
हर एक आहट पे दिल क्यों जवाँ है ,

कैसे कह दू की तुम लौट आओ
सब कुछ  यहाँ पहले जैसा कहाँ है

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