एक बार मिले थे तुमसे हम जिस जगह
घुमाते रहे जिंदगी भर उन गलियों में बे वजह,
उस गली के पथरों से भी अब गुफ्तगू है
घुमाते रहे जिंदगी भर उन गलियों में बे वजह,
उस गली के पथरों से भी अब गुफ्तगू है
कम नहीं राह तेरी मदीने से किसी तरह ,
तुमने न मिलने की कसम खाई तो हमें इत्तला हो
टूटे न तुम्हारी कसम जान गवाने की ज़रा सी वजह,
अब प्यार भी मुश्किल हुआ रब्बा मेरे किस तरह
खुदा माना तुम्हे और अरदास की हर जगह,
सुना था तू खवाबो को हकीक़त बनाता है
फिर हकीक़त को खवाब में ढाला किस तरह,
एक बार मिले थे तुम हमसे जिस जगह
घुमते रहे जिंदगी भर उन गलियों में बेवजह
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