'अच्छा सुनो मैंने परसों आगरा जाने का कार्यक्रम बनाया है। तुम दिल्ली से मेरे साथ चलो। शनिवार और रविवार है सो तुम्हारे ऑफिस से छुट्टी लेने का भी कोई झंझट नहीं है।' मोहन ने फ़ोन पर बहुत प्यारे लहजे में कहा।
अरे ऐसे कैसे बना लिया कार्यक्रम? मैं नहीं आ सकती। नलिनी की आवाज़ में बड़ी तल्खी थी।
बहुत दिन हुए तुमसे मिले तो सोचा मिलना हो जाएगा और मुझे कुछ काम भी आन पडा है आगरा में। अब चल पड़ो यार !
मेरे लिए बहुत मुश्किल है, तुम्हे काम है तो निपटा के आओ। मैं नहीं आ सकती।
मोहन को पता था कि नलिनी थोडा नाराज़ होगी क्यूंकि बिना उसकी सहमति लिए उसने ये कार्यक्रम निश्चित कर लिया था। परन्तु उसे विश्वाश भी था कि वो उसे मना लेगा।
'काम इतना जरुरी नहीं था, वो तो घर बैठे बैठे भी हो सकता था। तुमसे मिलना ही जरुरी है।
मुझसे क्यूँ मिलना है ? नलिनी ने पूछा।
मिलने का कोई मकसद अभी तक नहीं है दिमाग में। आजा बस कुछ बातें वातें करेंगे।
वो तो फ़ोन पर भी हो जाती हैं फिर मिलने का तात्पर्य ? नलिनी ने फिर तल्खी से कहा।
तात्पर्य हम्म !! घूमना है थोडा जीना है। थोड़ी मस्ती करनी है। तुम्हारे साथ दो दिन एक रात गुजारनी है। प्यार करना है। तुम्हे अपने बच्चों की अम्मां बनाना है। अब बताओ आ रही हो ? बड़े हल्के अंदाज में मोहन ने कहा।
नहीं मैं नहीं आ रही और अब मुझे बोलना भी मत आने के लिए। वरना फ़ोन भी बंद कर दूंगी।
अरे आजा यार तुम्हे पता है मैं एक फीसदी भी सीरियस नहीं हूँ और तू बना भी मत। आजा अच्छे दोस्त हैं तो बस ढेर सारी मस्ती होगी इसके अलावा कुछ भी नहीं।
पता है आज तक कुछ नहीं किया तो अब क्या करोगे। लेकिन मेरा आना संभव नहीं। कारण कुछ भी नही बस अच्छा सा फील नहीं हो रहा इसलिए मैं नहीं आ रही।
'अच्छा फील करवाने के लिए ही तो मिल रहा हूँ। अब नखरे छोड़ और हामी भर। ट्रेन सुबह सात बजे पहुंचेगी और तीस मिनट बाद रवाना होगी। मैं इंतज़ार करूंगा।' मोहन ने बहस ना करने के इरादे से बात को अंजाम देते हुए कहा और बाई साई की औपचारिकता के वगैर फ़ोन रख दिया था।
मोहन खुश था बहुत अर्से के बाद नलिनी से मिलने का संयोग बना था। ख़ुशी थी, चेहरे से जाहिर भी थी। पिछले तीन चार साल में दोनों ने एक दूसरे को बहुत समझा है। दोनों के बीच कभी झगड़ा या शिकायत नहीं थी। बेबाक बाते होती थी विषय चाहे जो भी हो जितना खुल के नलिनी मोहन से बात करती थी तो मोहन भी उतने ही खुले दिल से उसे स्वीकार कर रहा था। रिश्ता इतना गुढ़ा था जितना लंग़ोटिये यारों का होता है। संकोच का लेना देना दोनों से नहीं था। मुलाकाते बहुत कम हुयी थी बस दो तीन लेकिन जो भी हुयी थी सबकी नयी और दिलचस्प कहानिया बनी थी। दोनों ने कभी शिकायत इसके बारे में नहीं की थी। आज भी वो मुलाकाते और उनके होने का अस्तित्व दोनों मजेदार थे। कितनी ही बार उन सभी किस्सों को दुहरा कर वो हँसते रहे हैं। जिंदगी कभी कभी सही लोगों को ज़रा देर से मिलवाती है परन्तु मिलवाती जरुर है। जिनके मिलने पर ह्रदय जमीन पर रंग भरे गुलाब स्वत: खिलते हैं। जिनका साथ आत्मविश्वाश देता है। हंसी देता है। जिनके साथ बातें करके नाड़ियों में खून का संचार तो बढ़ जाता है पर ब्लड प्रेशर सही हो जाता है। जिनका फ़ोन न. डायल करते हुए सोचना नहीं पड़ता। वो लोग होते हैं बिना बातों के बात करने को, बिना मतलब के साथ हंसने को, अपनी बेवकूफियां सुनाने को और वो सब बताने को जिसके बारे में खुद को भी कम मालूम होता है। नलिनी और मोहन ऐसे ही दोस्त तो थे।
सही वक़्त पर गाड़ी चल पड़ी थी। जब किसी चीज के लिए वक़्त मुक़र्रर कर दिया जाए तो वो थोडा जल्द आता है। मोहन और नलिनी की मुलाकात का वक़्त भी। मोहन बहुत खुश था बहुत दिनों बाद वो अपने जिगरी से मिलने वाला था। ट्रेन रात को चलकर सुबह दिल्ली पहुँचने वाली थी। मोहन का मन था कि सुबह बहुत जल्द हो। इसीलिए मोहन ने फटाफट बिस्तर लगाया और नींद की आगोश में खोने का प्रयत्न करने लगा। नींद और नलिनी दोनों ही कोसों दूर थे। उसके मन में विचार ट्रेन की धडाधड के साथ आ जा रहे थे। इंतज़ार नाम की शै बहुत टेढ़ी है। जब करना पड़े तो मालूम पड़ता है कि हम एक बिन्दु पर तो सोच ही नहीं पाते। विचारों का समुन्दर बन जाता है। इंतज़ार के विचार समुन्द्र की लहर बने होते हैं, एक लहर आई फिर गयी। सोच भी एक आये फिर दूसरी आये फिर सब गढ़मगढ़। नलिनी को कह तो दिया था आने को। कभी दूसरी बार सोचने की जरुरत नहीं पड़ी परन्तु ह्रदय में एक डर भी आज पता नहीं किधर से आकर बैठ गया था। खैर सब लहरों के बीच मोहन को कब नींद आई पता नहीं चला।
थोडा शोर हुआ तो मोहन की आँख खुली। जल्दी से उठकर कोच की खिड़की पर आ गया। नई दिल्ली स्टेशन आ रहा था। नलिनी भी आ गयी होगी। उसे लेट लतीफी ज्यादा पसंद नहीं है वक़्त पर आ गयी होगी। मोहन ने घडी की तरफ देखा ट्रेन सही समय पर थी। कुछ कुली दरवाज़े के साथ साथ दौड़ने लगे थे। थोड़े से झटके के साथ ट्रेन रुक गयी थी। मोहन सबसे पहले उतरा और प्लेटफार्म पर उसकी नजर नलिनी को ढूंढने लगी। लोगो का हुजूम गाड़ी से उतरकर अपने गंत्यव की ओर बढ़ रहा था। नलिनी को मोहन बहुत दूर से पहचान लेता था। पहली मुलाकात के वक़्त भी उसे नलिनी को पहचानने में दिक्कत नहीं हुयी थी। दिल के रिश्ते अपने आप एक दुसरे को पहचान लेते हैं। ऐसा ही रिश्ता तो है। मोहन ने अपने पंजो पर खड़े होकर नलिनी को ढूंढने का फिर से प्रयास किया। नलिनी नहीं दिखी। मोहन ने सोचा दिल्ली का ट्रैफिक भी बहुत खराब है कहीं फंस गयी होगी।घर भी थोडा दूर है। मोहन प्लेटफार्म से स्टेशन के मुख्य दरवाजे पर आ गया था। फ़ोन पर एक दो बार अनायास हाथ गया फिर मोहन ने खिंच लिया, आ ही जायेगी। मोहन चहलकदमी करते हुए नलिनी का इन्तजार करने लगा।वक़्त गुजर रहा था और मोहन का ह्रदय भी भारी होने लगा था। नलिनी ने आने को हामी भी नहीं भरी थी। कहीं नहीं आई तो ! मोहन ने सर को झटका विचार को बाहर फेंका। उसने घड़ी देखी। ट्रेन के चलने में अभी पांच मिनट थे। अभी मुझे एक फ़ोन तो कर लेना चाहिए। नहीं। मोहन का हाथ फिर से फ़ोन पर था लेकिन नलिनी को अगर आना होगा तो जरुर आएगी अन्यथा अभी फ़ोन का कोई मतलब नहीं है। ट्रेन का वक़्त होने चला था। नलिनी नहीं थी। कहीं भी मोहन को नजर नहीं आ रही थी। ट्रेन ने सिटी बजा दी थी। मोहन ने फिर से पुरे स्टेशन पर नजर घुमाई और प्लेटफार्म की तरफ कदम बढाने लगा। मोहन की नजर बहुत बेचैनी से नलिनी को खोज रही थी। ट्रेन ने चलने का मन बना लिया था। नलिनी ने नहीं आने का।
मोहन के कदम बहुत भारी हो चले थे। ट्रेन को पकड़ने की हिम्मत नहीं थी। परन्तु दूसरा कोई रास्ता भी नहीं था। नज़रों को स्टेशन के दरवाजे पर छोड़कर मोहन ने ट्रेन के दरवाजे को पकड़ लिया। रिश्तों में गिले शिकवो का दौर भी आ ही गया।नलिनी नहीं आई।
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